आप सांई को मानते हैं या सांई की मानते हैं?

शिर्डी सांई 21 दिए की पूजा
आप सभी को गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं।
क्या आप ने ध्यान दिया गुरू का दिन पूर्णिमा पर मनाते हैं।
सही ही तो है..गुरू का अर्थ ही है अंधकार दूर करने वाला ..बिल्कुल पूनम के चांद की तरह।
वो सटका (छडी़) भी मारते हैं.. तो चांद जैसे शीतल प्रेम में ।
(प्रेम में ..प्रेम से नहीं 🤭)
आप के गुरू की कृपा दृष्टी आप पर सदा बनी रहे।
ऊपर की तस्वीर सांईबाबा की एक प्यारी बच्ची ..सुचिता ने मुझसे सांझा की।😊
उस ने आज बाबा के लिए अपनी श्रद्धा के 21 दीप जला कर पूजा की।❤️
हम आए दिन गुरू के बारे में तो बात करते ही रहते हैं.. चलिए आज शिष्य के बारे में चर्चा करें।
सांई सच्चरित्र में लिखा है कि शिष्य तीन प्रकार के होते हैं..
1.पहले वो जो गुरू की बात सुनकर भी पालन ना कर पाए।
2.दूसरे वो जो गुरू की बात सुनकर पालन ज़रूर करें।
3.तीसरे वो जो गुरू के कहने से पहले ही उनके दिल की बात जानकर उनका पालन करे।
मुझे तो लगता है..मैं पहली श्रेणी में ही हूं ..
ऐसा लगता है बाबा मुझे उनकी राह पर चलाते नहीं, घसीटते है।😂
सांई सच्चरित्र की एक घटना की बात करें.. जब सांई ने नाना साहेब चांदोरकर जी को गीता के एक श्लोक का सार समझाया।
(अध्याय 39)
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।
 
 
जब बाबा ने नाना से पूछा कि वो जो श्लोक धीरे धीरे गुनगुना रहे  हैं ,उसका अर्थ क्या है? तब नाना ने उसका सीधा सीधा ये मतलब बताया…
“तत्व को जानने वाले ज्ञानी पुरूषों (जैसे सांई गुरूराया) को भली प्रकार दंडवत कर, सेवा और निष्कपट भाव से किए गए प्रश्न द्वारा ज्ञान को जानो। वें ज्ञानी , जिन्हें ब्रह्म की प्राप्ति हो चुकी हैं ,तुम्हे ज्ञान का उपदेश देंगे।”
अब सांई ने उन्हें एहसास कराया कि इसका सही अर्थ क्या है!
शायद ऐसा ही हमारे जीवन में भी होता है ..हमे लगता है कि हम ने ग्रंथ पढ़ लिए तो हम सब जान गए हैं।
जबकि सच ये है कि जब तक ये शाब्दिक अर्थ जीवन की परिस्थितियों में ना महसूस किया जाए तब तक ये ज्ञान अधूरा ही है।
 
यही अंतर है ..
ज्ञान और अनुभव में।
और ये अर्थ वहीं समझा सकता है जो खुद उसकी अनुभूति कर चुका हो ।
मैं वो अर्थ समझाने लायक तो नहीं पर जो अनुभूतियां सांई ने मुझे मेरे जीवन में करवाई ,वो मैं आप से सांझा कर सकती हूं।
तो श्लोक पर वापस लौटते हैं..
सांई बाबा ने नाना से प्रश्न पर प्रश्न कर उन्हें एहसास करा दिया कि उस श्लोक का अर्थ उतना ही नहीं है, जितना वो तब तक समझते आ रहे थे।
बाबा कहते हैं..
1पहली बात..
ज्ञानियों को केवल साष्टांग नमस्कार करना काफी नहीं है ..हमें सदगुरू के प्रति अनन्य भाव से शरणागत होना चाहिए।
अब इसका जीवन में आशय देखें तो ..मुझे सिर्फ इतना पता है कि अगर किसी कठिन परिस्थिती में मुझे चिंता सताने लगे तो मैं शरणागत तो बिल्कुल नहीं हूं।😅
अगर आप अपनी तरफ से सबसे अच्छा काम करके ..कोशिश करके सारी चिंता छोड़ देते हैं , चाहे कैसे भी विचार क्यो ना आए पर कुछ भी आपके बाबा पर विश्वास को कम न कर पाए तो आप मेरी नज़र में शरणागत है।
डरावने विचार आना स्वाभाविक है .. हम विचारों को तो नहीं रोक सकते पर उन विचारों को खुद पर जो हावी ना होने दें ,वो शरणागत है।
2 दूसरी बात जो बाबा ने कही..
केवल प्रश्न पूछना काफी नहीं ..बल्कि उस सवाल के पीछे भावना क्या है ..ये महत्त्वपूर्ण है।
सवाल गुरू को परखने के लिए या गुरू की बात में गलती निकालने के लिए पूछा गया है या सिर्फ उत्सुकता में मोक्ष प्राप्ति या आध्यात्मिक पथ पर कैसे बढा जाएं इसलिए पूछा गया है .. ये बात ध्यान देने योग्य है।
सांई कहते हैं इसलिए “व्यास” ने श्लोक में “प्रश्न” की जगह “परिप्रश्न” का उपयोग किया।
अब इसे जीवन में बिठाकर देखें तो पता चलता है कि मैने लगभग एक साल से ही सही प्रश्न‌ पूछने शुरू किए है .. उससे पहले मैं आध्यात्मिक पथ क्या होता है, नहीं जानती थी।
(अब भी नहीं जानती 😄)
इसलिए ये कहना सही होगा कि ये सही प्रश्न हम तब ही कर पाते हैं जब हमें यह एहसास होता है कि..
” यह मेरा जीवन है.. मेरा रास्ता है ..इसे जीना मुझे है ..इस पर चलना मुझे है ..तो इसे बेहतर बनाने के लिए बदलाव भी खुद में ही लाने होंगे।दुनिया को कोसने से मुझे ना खुशी मिलेगी ना ही दूसरे लोग कभी बदलेंगे।”
और ये तब होता है जब आप सब तरीके अपना कर देख लेते हैं ..अपने जीवन को बेहतर बनाने के या परेशानियों से बचने के।
तब हम किसी ज्ञानी पुरूष से परिप्रश्न करने लगते हैं।
3.तीसरी बात
सिर्फ गुरू के पैर दबाने को सेवा नहीं कहते।
 
जब शिष्य को ये लगना बंद हो जाए कि गुरू की सेवा करने ना करने के लिए वो स्वतन्त्र है .. जब उसे लगे कि उसके शरीर और उसके द्वारा की गई सेवा पर सिर्फ गुरु का नियंत्रण है ..उसे सही अर्थ में सेवा कहते है।
 
मुझे याद आ रहा है.. पिछली साल की गई ध्यान साधना के समय सांई मुझे सुबह 4 बजे तो कभी 3:30 बजे ही उठने का आदेश दे देते थे।
एक बार तो मुझे उठाने के लिए उन्होंने धमकी भी दी “उठ जा नहीं तो सटके से मारूंगा।” 😅
मैं बाबा से नींद में ही बोलती “बाबा थोड़ी देर और सो लेने दो ना।”
फिर बाबा उठाते 5‌ बजे ..पर मैं फिर सो जाती।
तो यहां जो भाव था मेरा कि मेरे शरीर पर मेरा अधिकार है ..मैं चाहुं तो उठ जाऊं और मेरा मन करे तो मैं सोती रहूं .. इसे सेवा नहीं कह सकते।
बाकि सांई जाने वो सेवा भाव कब आएगा।
पर यह सवाल खुद से बार बार पूछते ज़रूर रहें ..
“आप सांई को मानते हैं या सांई की मानते हैं?”
क्यूंकि यही इस भाव कि पहली सीढ़ी है।
लिखने में कोई गलती हुई हो तो माफ़ करना।
आज के लिए इतना ही।
यह हिन्दी में लिखी पहली post है।
आप इन शब्दों को समझ सके या नहीं मुझे ज़रूर बताएं।
आप मुझ से सम्पर्क कर सकते हैं मेरे email पर
अपना ख्याल रखे।
हंसते, मुस्कुराते रहे।🤗
सदा सांई की छत्रछाया में रहे।।😇
ऊं सांई राम😊

5 Replies to “आप सांई को मानते हैं या सांई की मानते हैं?”

  1. Hamara sai pr vishwaash hai. Ha thoda life me up down aate hai to hum baba se naraaj bhi ho jaate hai. Pr fir ahsaas hone pr maan bhi jaate hai 😀😄

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